ट्रेन में अकेली इस लड़की की कहानी पढ़कर दिल भर आएगा आपका

वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डिब्बे में बाथरूम के तरफ वाली सीट पर बैठी थी। उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीटी ने आकर पकड़ लिया तो…! कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलटकर टीटी के आने का इंतजार करती रही। शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी। देखकर यही लग रहा था कि जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें आकर बैठ गयी। शायद ज्यादा लम्बा सफर भी नहीं करना होगा। सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बैग दिख रहा था। मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा। फिर थोड़ी देर बाद वो खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया। लगभग 1 घंटे के बाद टीटी आया और उसे उठाया।

कहां जाना है बेटा?

अंकल दिल्ली तक जाना है?

टिकट है?

नहीं अंकल जनरल का है लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी।

अच्छा 300 रुपये की पेनाल्टी बनेगी।

ओह अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं।

ये तो गलत बात है बेटा। पेनाल्टी तो भरनी ही पड़ेगी।

 

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सॉरी अंकल मैं अलगे स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चली जाऊंगी। मेरे पास सच में पैसे नहीं हैं। कुछ परेशानी आ गई, इसलिए जल्दबाजी में घर से निकल आई और ज्यादा पैसे रखना भूल गयी।

बोलते बोलते वो लड़की रोने लगी। टीटी ने उसे माफ किया और 100 रुपये में उसे दिल्ली तक उस डिब्बे में बैठने की परमीशन दे दी। टीटी के जाते ही उसने अपने आंसू पोंछे और इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा। थोड़ी देर बाद उसने किसी को फोन लगाया और कहा कि उसके पास बिल्कुल भी पैसे नहीं बचे हैं दिल्ली स्टेशन पर कोई जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे वरना वो समय पर गांव नहीं पहुंच पाएगी।

मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी। न जाने क्यों उसकी मासूमियत देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था। दिल कर रहा था कि उसे पैसे देदूं और कहूं कि तुम परेशान मत हो और रो मत। लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात सोचना थोड़ा अजीब था। उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है शायद सुबह से और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे। बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय निकालने सोचने लगा ताकि मैं उसकी मदद कर सकूं और फ्लर्ट भी ना कहलाऊं।

 

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फिर मैंने एक पेपर पर नोट लिखा। बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूं। जानता हूं कि एक अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब भी होगा और शायद तुम्हारी नजर में गलत भी, लेकिन तुम्हें इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है, इसलिए यह 500 रुपये दे रहा हूं। तुम्हें कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा पता भी लिख रहा हूं। जब तुम्हें सही लगे मेरे पते पर पैसे वापस भेज सकती हो। वैसे मैं नहीं चाहूंगा कि तुम पैसे वापस करो। मैंने एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा और चाय वाले को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे भेजा है।

नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर देखा कि कोई उसकी तरफ देखता हुआ नजर आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने भेजा। लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुंह पर चादर डालकर लेट गया था। थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट महसूस की। लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतजार था। उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर थमा दिया फिर चादर का कोना हटा- हटाकर हर थोड़ी देर में उसे देखकर जैसे सांस ले रहा था मैं। पता ही नहीं चला कब आंख लग गई। जब आंख खुली तो वो वहां नहीं थी।

 

 

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ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर ही रुकी थी और उस सीट पर एक छोटा सा नोट रखा था। मैंने झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया और उस पर लिखा था- थैंक्यू मेरे अजनबी हमसफर, आपका ये अहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगी। मेरी मां आज मुझे छोड़कर चली गयी हैं। घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है, इसलिए आनन-फानन में घर जा रही हूं। आज आपके इन पैसों से मैं अपनी मां को श्मशान जाने से पहले एक बार देख पाऊंगी। बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें ज्यादा देर घर में नहीं रखा जा सकता। आज से मैं आपकी कर्जदार हूं। जल्द ही आपके पैसे लौटा दूंगी। उस दिन से उसकी वो आंखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने की वजह बन गए थे। हर रोज पोस्टमैन से पूछता था शायद किसी दिन उसका कोई खत आ जाए। आज 1 साल बाद एक खत मिला। आपका कर्ज अदा करना चाहती हूं। लेकिन खत के जरिये नहीं, आपसे मिलकर नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था और आखिर में लिखा था
तुम्हारी अजनबी हमसफर।

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