सरकारी स्कूल vs मॉडल स्कूल जानिये क्या हाल है

राज्य में एक ओर ऐसे विद्यालय हैं, जिनके शिक्षकों के वेतन पर सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, पर इन विद्यालयों का रिजल्ट संतोषजनक नहीं हो रहा है. विद्यालय के आधे से अधिक बच्चे फेल हो जा रहे है. वर्ष 2016 इंटर साइंस की परीक्षा में 15 विद्यालयों में अपने संकाय में एक भी विद्यार्थी पास नहीं हो सके. वहीं, दूसरी ओर मॉडल स्कूल हैं. कहने के लिए यह स्कूल मॉडल हैं, पर इसकी वास्तविक स्थिति नाम के विपरीत है. विद्यालय का न तो अपना भवन है और न ही स्थायी शिक्षक. जो शिक्षक हैं, उन्हें कभी भी समय पर मानदेय नहीं मिलता. बच्चों को समय पर किताब नहीं मिलती, इसके बाद भी मैट्रिक परीक्षा 2016 में इन स्कूलों का रिजल्ट शत-प्रतिशत रहा.

रांची: केंद्र सरकार ने वर्ष 2011 में देश भर में शैक्षणिक रूप से पिछड़े प्रखंड में केंद्रीय विद्यालय की तर्ज पर मॉडल स्कूल खोलने की योजना शुरू की थी. विद्यालय को मॉडल स्कूल का नाम दिया गया था. झारखंड में कुल 203 मॉडल स्कूल खोले जाने थे. प्रथम चरण में वर्ष 2011 में 40 तथा 2013 में 49 मॉडल स्कूल खोले गये. वर्ष 2014 में 75 मॉडल स्कूल की स्वीकृति केंद्र सरकार द्वारा दी गयी थी. वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया. वर्ष 2014 में स्वीकृत विद्यालय भी नहीं खुल सके.

झारखंड में वर्तमान में 89 मॉडल स्कूल चल रहे हैं. विद्यालय को केंद्रीय विद्यालय की तर्ज पर खोला गया था, इसमें अंगरेजी माध्यम से पढ़ाई होती है. विद्यालय खोलने का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को अंगरेजी माध्यम से शिक्षा देना था़ मॉडल स्कूल के लिए अब तक भवन निर्माण का कार्य पूरा नहीं हुआ़ स्कूल पहले से चल रहे विद्यालय के एक-दो कमरे में चल रहा़ प्रथम चरण में खुले 40 विद्यालय के भवन निर्माण का कार्य चल रहा है़ अभी तक कोई विद्यालय नये भवन में शिफ्ट नहीं हुआ है़, जबकि दूसरे चरण में खुले 49 विद्यालय के भवन निर्माण का कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है़ ऐसे में विद्यालय वर्षों से उधार के भवन में चल रहा है़ इनमें से प्रथम चरण में खुले 40 विद्यालय के प्रथम बैच के विद्यार्थी वर्ष 2016 की मैट्रिक परीक्षा में शामिल हुए थे.

विद्यालय में सभी विषय के शिक्षक नहीं होने व समिति संसाधन के बाद भी इन विद्यालय के बच्चों ने मैट्रिक परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की है. विद्यालय के पहली बार परीक्षा में शामिल 96 फीसदी विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए. इनमें से 13 स्कूलों का रिजल्ट शत-प्रतिशत रहा. विद्यालय से परीक्षा में शामिल 550 विद्यार्थी में से 436 विद्यार्थी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए.

शिक्षक को प्रति घंटी मिलता है मानदेय : विद्यालय में स्थायी शिक्षक की नियुक्ति नहीं की गयी है. विद्यालय में कंट्रैक्ट पर प्रति घंटी के हसिाब से मानेदय भुगतान पर शिक्षक रखे गये हैं. एक शिक्षक को एक घंटी के लिए 120 रुपया दिया जाता है.मानदेय का भुगतान भी समय पर नहीं होता़ कई बार तो छह-छह माह शिक्षकों को मानदेय नहीं मिलता़ ऐसे में विद्यालय का पठन-पाठन प्रभावित होता है़ विद्यालय में वर्ष 2015 तक मात्र गणित, विज्ञान व सामाजिक विज्ञान के शिक्षक थे. इस वर्ष स्कूली शिक्षा व साक्षरता विभाग ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारी को मॉडल स्कूल में सरकारी विद्यालय के शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति का आदेश दिया, पर सभी स्कूलों में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति नहीं हो पायी़ झारखंड माध्यमिक शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा जून 2015 में मॉडल स्कूल के मानदेय बढ़ोतरी का निर्णय लिया गया था, जसिमें शिक्षक को अधिकतम 27,500 व न्यूनतम 18,750 रुपये मानदेय देने की स्वीकृति दी गयी थी, पर शिक्षकों को अब तक बढ़ा हुआ मानदेय नहीं दिया जा रहा है.

बच्चों को नहीं मिलती किताब

मॉडल के स्कूल के बच्चों को सरकार की ओर से नि:शुल्क पुस्तक देने का प्रावधान है. बच्चों को अंगरेजी माध्यम की किताब दी जानी है. सरकार की ओर से कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को ही किताब उपलब्ध करायी जाती है. कक्षा नौ व दस के लिए बच्चों को अब तक किताब नहीं दी गयी है. इससे बच्चाें को पढ़ाई में काफी परेशानी होती है. इसके अलावा कक्षा छह से आठ तक के बच्चों मिलने वाली किताब भी समय पर नहीं दी जाती.

प्रति वर्ष खाली रह जाती सीट

विद्यालय में प्रति वर्ष सीट खाली रह जाती है़ विद्यालय में कक्षा छह में टेस्ट के आधार पर नामांकन लिया जाता है़ नामांकन टेस्ट झारखंड एकेडमिक काउंसिल द्वारा ली जाती है़ एक विद्यालय में 40 बच्चों के नामांकन का प्रावधान है़ वर्ष 2015 में 86 विद्यालय में सीट रिक्त रह गयी. कुछ विद्यालयों में तो नामांकन के लिए चयनित बच्चों की संख्या 10 से भी कम थी़

रांची : सीबीएसइ 12वीं में इस वर्ष दिल्ली के सरकारी स्कूलों का रिजल्ट निजी स्कूलों से बेहतर रहा़ 88.98 फीसदी बच्चे पास हुए. इसके उलट झारखंड के कई सरकारी स्कूलों के शत-प्रतिशत विद्यार्थी अपने संकाय में फेल हो गये़ साइंस में मात्र 58 फीसदी बच्चे पास हुए. राज्य सरकार एक प्लस टू शिक्षक को प्रतिमाह 48 हजार रुपये वेतन देती है़ क्या ऐसा आउटपुट देनेवाले शिक्षक, जिनके विद्यालय के शत-प्रतिशत बच्चे फेल हो गये, उन्हें बने रहने का अधिकार है़ स्कूलों के संचालन के लिए मुख्यालय से लेकर प्रखंड तक अधिकारी नियुक्त हैं. इनके वेतन पर भी प्रतिमाह करोड़ों रुपये खर्च है़ इसके बाद भी प्रति वर्ष लगभग आधे विद्यार्थी फेल हो जाते है़ं.

इंटर 2016 की परीक्षा में 18 स्कूल-कॉलेज में साइंस व 12 में कॉमर्स में एक भी विद्यार्थी पास नहीं हो सका. इनमें 15 प्लस टू उच्च विद्यालय स्कूली शिक्षा व साक्षरता विभाग द्वारा संचालित हैं. इन 15 सरकारी स्कूलों के कुल 77 बच्चों ने परीक्षा लिखी थी. इन्हें पढ़ाने के लिए यहां कुल 75 शिक्षक नियुक्त हैं. एक शिक्षक को प्रतिमाह 48 हजार रुपये वेतन मिलता है. इन शिक्षकों के वेतन पर सालाना 4.32 कराेड़ रुपये खर्च है. इनमें से कुछ स्कूल ऐसे हैं, जहां परीक्षा में शामिल विद्यार्थी व शिक्षक के वेतन को मिला कर सरकार एक बच्चे पर प्रति माह 16000 रुपये तक खर्च कर रही है़. पर, पढ़ाई ठीक नहीं होने के कारण सरकार का प्रति वर्ष करोड़ों रुपये बेकार जा रहा है़ .

शिक्षक नियुक्ति के बाद रिजल्ट और खराब : राज्य में इंटर साइंस के रिजल्ट में इस वर्ष छह प्रतिशत की गिरावट आयी है़ प्लस टू उच्च विद्यालयों में इंटर की पढ़ाई को बेहतर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2012 में 1233 प्लस टू शिक्षकों की नियुक्ति की गयी थी़ इसके बाद भी इन विद्यालयों का रिजल्ट बेहतर नहीं हो रहा़ कुछ प्लस टू उच्च विद्यालय ऐसे हैं, जिनका रिजल्ट शिक्षक नियुक्ति के बाद और खराब हो गया है़ इन विद्यालयों में पहले मध्य विद्यालय के उच्च योग्यताधारी शिक्षक नियुक्त थे. उस समय इन स्कूलों का रिजल्ट अब की तुलना में बेहतर हुआ करता था़ रिजल्ट खराब होने के कारण इन स्कूलों में बच्चे नामांकन भी नहीं लेते है़ं यही कारण है कि राज्य के अधिकांश प्लस टू उच्च विद्यालय में साइंस में सीट खाली रह जाती है.

राजधानी का प्लस टू उवि निजी स्कूल से भी महंगा

राजधानी के प्लस टू उच्च विद्यालयों की स्थिति और भी खराब है़ विद्यालय में कार्यरत शिक्षक व नामांकित विद्यार्थियों की संख्या के हसिाब से सरकार एक विद्यार्थी पर निजी स्कूल से अधिक खर्च करती है़ इसके बाद भी विद्यालय से एक भी विद्यार्थी पास नहीं हो पाता है़ राजधानी में ऐसे भी प्लस टू उच्च विद्यालय हैं, जहां सरकार एक विद्यार्थी पर प्रतिमाह 16000 रुपये तक खर्च कर रही है़ कसिी निजी स्कूल में एक विद्यार्थी के लिए प्रतिमाह इतना शुल्क नहीं लिया जाता है़ सरकार द्वारा वर्ष 2015 को गुणवत्ता युक्त शिक्षा के रूप में मनाया गया. विभिन्न योजनाएं भी चलायी जा रही है़ं इसके बाद भी रिजल्ट में सुधार नहीं हो रहा है़

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