जानिए नोट बंदी 2016 का फैसला कहां तक सही है

सरकार ने 500-1000 रुपए के नोटों को बंद करके 500 और 2000 रुपए के नए नोट निकालने का फैसला किया है। इससे महज 4 घंटे में ही देश की 87% यानी 15 लाख करोड़ रुपए की करंसी इकोनॉमी से बाहर हो गई। 2000 रुपए का नोट लाने का फैसला पहली बार किया गया है। हालांकि हाई वैल्यू नोटों को अचानक बंद करने का यह कोई पहला फैसला नहीं है। इससे पहले भी 1946 और 1978 में ऐसे फैसले किए गए थे। अब तक सबसे ज्यादा मूल्य का 10 हजार रुपए का नोट पहले 1938 में, फिर 1954 में छापा गया था। लेकिन इस नोट को जनवरी 1946 और फिर दोबारा जनवरी 1978 में (38 साल पहले) बंद कर दिया गया था।

अभी 500 रुपए के 1600 करोड़ नोट चलन में हैं। यानी 8.25 लाख करोड़ रुपए। इसी तरह 1000 रुपए के 670 करोड़ नोट चलन में हैं। यानी 6.70 लाख करोड़ रुपए।
इन दोनों तरह के नोटों की देश में चल रही करंसी में कुल हिस्सेदारी 87% है।
नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात 8 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन जारी कर एलान किया कि 500 और 1000 रुपए के नोट आधी रात से बंद हो जाएंगे।
यानी महज 4 घंटे में देश की इकोनॉमी से 14 लाख करोड़ रुपए की करंसी बाहर हो गई। इसका मतलब अगले कुछ दिन 13% करंसी से देश की इकोनॉमी चलेगी।
87% करंसी एक झटके में बाहर होने से देश करंसी के मामले में 15 साल पीछे चला गया। 2001 में 2,12,460 करोड़ रुपए चलन में थे।

पहली बार 1946 में बंद किए गए थे नोट
न्यूज एजेंसी के मुताबिक, 1000 रुपए के नोट समेत हाई वैल्यू वाले कई नोटों को पहली बार जनवरी 1946 में बंद किया गया था। फिर 1978 में इन्हें दोबारा बंद किया गया था।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के डाटा के मुताबिक, अब तक सबसे ज्यादा मूल्य का 10 हजार रुपए का नोट 1938 में प्रिंट हुआ था। फिर इसे 1954 में भी प्रिंट किया गया था।
लेकिन इस नोट को पहले जनवरी 1946 और फिर दोबारा जनवरी 1978 में बंद कर दिया गया था।
1946 से पहले भी चलन में थे हजार के नोट
1000 रुपए और 10000 रुपए के नोट जनवरी 1946 से पहले भी चलन में थे।
1954 में हाई वैल्यू वाले 1 हजार, 5 हजार और 10 हजार के नोटों को रि-इंट्रोड्यूस किया गया था।
जनवरी 1978 में इन नोटों को बदल दिया गया था।

1987 में आया था 500 रु. का नोट
पांच सौ का नोट अक्टूबर 1987 में निकाला गया था।
जबकि एक हजार रुपए का नोट नवंबर 2000 में वापस लौटा था।
तब इन्फ्लेशन की वजह से नोट्स के वॉल्यूम को कंट्रोल करने की कोशिश की गई थी।

आम जनता के सब्र का बांध टूट रहा है सरकार जल्दबाजी में फैसले ले रही है

जानिये क्या करेगी मोदी सरकार कालेधन को इक्कठा कर

नोटबंदी 2016 के ऐलान के दिन आरबीआई के पास 500 ,1000 रुपये का एक भी नया नोट नहीं था कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिए आईटी नेटवर्क मजबूत करने की जरूरत बिना खाते और कार्ड के कैसे बनें डिजिटल? लाखों कर्मचारी और मजदूर तंगी में देश में डिजिटल कारोबार को बढ़ावा देने के लिए गठित मुख्यमंत्रियों की कमेटी ने आरबीआई से डेबिट और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल पर लगने वाले शुल्क को घटाने की सिफारिश की है. अगर डिजिटल कारोबार को बढ़ावा देना है तो कार्ड से पेमेंट पर चार्ज आधे से भी कम करना होगा.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के रोज बदलते फैसलों से पैसा जमा करने वाली आम जनता और बैंक में काम करने वाले कर्मचारी दोनों ही परेशान हैं. पिछले 43 दिनों में आरबीआई रोज नए सर्कुलर ला रही है. बैंक कर्मचारी कहते हैं कि वे कैश संभालें, कतार संभालें या फिर आरबीआई के नए-नए सर्कुलर देखें.

आम जनता के सब्र का बांध टूट रहा है सरकार जल्दबाजी में फैसले ले जा रही है लेकिन गरीब को तो हमेशा से ही परेशानी होती हुई आई है मोदी सरकार के नोट बंदी के निर्णय से पहली बार धनकुबेरों को भी बहुत परेशानी उठानी पड़ी है अगर देखा जाए तो मोदी सरकार के इस निर्णय से गैरकानूनी ढंग से कमाया हुआ धन सरकार बाहर निकालने में कुछ हद तक कामयाब रही है अब आगे क्या होगा यह तो वक्त ही बताएगा

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