मध्यकाल में मौजूद कुरीतियो ने की समाज में सामाजिक विषमता पैदा

मध्यकाल में मौजूद कुरीतियो ने की समाज में सामाजिक विषमता पैदा समाज के उच्च वर्ग के लोगो ने समाज के निचले तबके के लोगों के अधिकारों की व्याख्या अपने संदर्भ में की तथा प्रकृति द्वारा दिए गए समानता के अधिकार को छीन लिया गया

समाज के एक तबके को असभ्यता के किनारे पर खड़ा कर दिया जो किसी उच्च वर्ग के विवेकशील द्वारा उच्च वर्ग के विवेकहीन के संदर्भ में नहीं किया जाता था वह एक निम्न वर्ग के विवेकशील के साथ किया जाता था  ऐसी थी हमारी सामाजिक व्यवस्था इस सामाजिक व्यवस्था से जात पात छुआ छूत की भावना का जन्म हुआ जिसने इंसान के अंदर वर्ण के आधार पर भेद कर दिया तथा जात पात का बीज अंकुरित कर दिया आज यही सामाजिक असमानता हमारे समाज की जड़ों में मौजूद है तथा समाज की नींव को खोखला कर रही है

हमारी सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण किया जाना जरूरी है यह वयस्था एक बेहतर समाज के निर्माण के सपने को साकार नहीं कर सकती इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए सिर्फ विधि द्वारा उठाए गए कदम काफी नहीं है विधि द्वारा उठाए गए कदमों के द्वारा नियमों का पालन करना सुनिश्चित होता है और दूसरा हमारे समाज में साक्षरता दर की कमी के कारण लोगों के पास विधि का ज्ञान नहीं है

एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए गांधी द्वारा दिए गए हृदय परिवर्तन के सिद्धांत का पालन करना तथा स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वेदों की ओर लौटो के सिद्धांत का प्रतिपादन जहां पर वर्ण व्यवस्था कर्मकत थी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र एक ही परिवार के सदस्य होते थे हमारे समाज को ऐसी व्यवस्थाअपनाने की जरूरत है यह दोनों सिद्धांत आधुनिक भारत की अनेक समस्याएं जैसे जात-पात छुआछूत लिंग भेद आदि की समस्याओ का समाधान प्रस्तुत करती है

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