क्यों खरीदी इस जोड़े ने 300 एकड़ बंजर जमीन भारत में

क्यों खरीदी इस जोड़े ने 300 एकड़ बंजर जमीन भारत में अमरीका के इस जोड़े ने भारत में 300 एकड़ के बंजर जमीन को खरीदकर उसे एक अभ्यारण्य में बदल दिया

नई दिल्ली। वर्ष 1990 में अमरीका का एक युगल कर्नाटक के जंगलों में घूमने आया था। उसने वहां पर दर्जन भर हाथी और एक बड़ा पेड़ देखा जो लगभग 700 साल पुराना था। पेड़ पर तमाम तरह के पक्षी बैठे थे। वहीं उन्होंने जंगल में कुछ शिकारियों को देखा और वहीं से दोनों ने जंगली पशुओं की रक्षा करने का संकल्प ले लिया। इसके बाद इस जोड़े ने जंगली पशु-पक्षियों को सुरक्षित घर देने के लिए 300 एकड़ बंजर जमीन खरीद डाली। इनका नाम पामेला और अनिल कुमार मलहोत्रा है। इस तरह देश को पहली बार एक प्राइवेट वाइल्ड लाइफ सेंचुरी मिली। ये सेंचुरी कर्नाटक में है। आज इस जगह का नाम मल्होत्रा सेव एनिमल्स इनिशियेटिव (एसएआई) अभ्यारण्य है और यहां दुर्लभतम जीव भी पाए जाते हैं।

अनिल दून स्कूल से पढ़े हुए हैं और भारत आने से पहले वह अमरीका में रियल एस्टेट और रेस्टोरेंट बिजनेस से जुड़े थे। 1991 में अनिल (75 साल) और पामेला (64 वर्ष) देश के दक्षिणी हिस्से में अपने एक दोस्त के कहने पर यहां जमीन खरीदने आए थे। यहां 55 एकड़ की बेकार पड़ी हुई जमीन थी। जमीन का मालिक अपनी जमीन इसलिए बेचना चाहता था क्योंकि यहां वह कॉफी या कोई भी दूसरी चीज नहीं पैदा कर पा रहा था।

1960 में अमरीका के न्यू जर्सी में इस जोड़े की मुलाकात हुई और जल्द ही शादी भी कर लिया। जब वो अपने हनीमून के लिए हवाई गए तो उसकी खूबसूरती को देखकर वहीं रहने भी लगे। अनिल बताते हैं कि वहीं उन्होंने प्रकृति की कीमत भी जानी और यह भी समझा कि ग्लोबल वॉर्मिंग के बीच जंगलों को बचाने के लिए कोई भी महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

मल्होत्रा 1986 में अपने पिता का अंतिम संस्कार करने भारत आए। जब वे हरिद्वार गए तो वहां गंगा नदी की स्थिति देखकर डर गए। जंगलों को वहां जिस गति से काटा जा रहा था, उसे देखकर उन्हें काफी बुरा लगा। अभ्यारण्य बसाने के लिए उन्होंने उत्तरी भारत में जगह की तलाश शुरू की लेकिन कहीं भी मनचाही जगह नहीं मिल सकी। इस वजह से उन्हें काफी निराशा हुई।

जब उन्हें उत्तरी भारत में जमीन नहीं मिली तो उन्होंने दक्षिण भारत में जमीन खोजने का सिलसिला शुरू किया। एक दोस्त की मदद से उन्हें ब्रह्मगिड़ी के माउंटेन रेंज में वेस्टर्न घाट के नजदीक जमीन मिल गई। इस जमीन को खरीदने के लिए उन्होंने हवाई में स्थित अपनी जमीन बेच दी और यहां आ गए। लेकिन जल्द ही वे यह समझ गए कि जब तक उनकी झरने के पास वाली जमीन के नजदीक दूसरे लोग पेस्टिसाइड का प्रयोग करते रहेंगे, जंगल की देखभाल करने और उसे संवारने का उनका काम पूरा नहीं हो सकेगा।

उन्होंने इसके बाद झरने के आस-पास वाली जमीन भी खरीदनी शुरू कर दी। इस क्षेत्र के ज्यादातर किसान जमीन के इन हिस्सों से अच्छी पैदावार नहीं कर पाते थे। उन्हें इसके बदले जब अच्छी रकम मिलने लगी तो उन्होंने जमीन बेचना स्वीकार कर लिया। इस जंगली जमीन पर उन्होंने तमाम तरह के पेड़-पौधे लगाने शुरू किए।

जंगल में आने वाले पशु-पक्षियों को शिकारियों से बचाने के लिए उन्होंने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का सहारा लेना भी लिया। इस काम में कई ट्रस्ट के लोगों ने भी मदद शुरू की। वे बड़ी कंपनियों से भी जमीन खरीदने और उस पर जंगल बसाने के लिए बातचीत कर रहे हैं। पामेला का कहना है कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को यह समझने की जरूरत है कि बिना स्वच्छ पानी के वे कुछ भी नहीं कर सकते हैं।

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