जानिये क्या किम्मत चूका रहे है हम विकास के नाम पर

विकास के नाम पर हम इतनी बड़ी किम्मत चूका रहे है की आने वाले समय में हमे बहुत बड़ा विनाश देखने को मिल सकता है 2050 में बहुत बड़े विनाश की आसंका है
पर्याप्त सबूतों के आधार पर आप को बताने जा रहे है एक समय था जब भारत में पेड़ों की संख्या बहुत ज्यादा थी हम बात कर रहे है 4000 वर्ष पहले की हरियाली से ढका हुआ था पूरा भारत

किसी भी देश में विकास और परिवर्तन जरूरी है मगर किस कीमत पर विकास हो ये देखना बहुत जरूरी है 4000 वर्ष पहले अगनि पुराण में बताया गया है की मनुस्य को पेड़ पोधो की रक्षा करनी चाहिए जिस प्रकार उसे जीवन जीने के लिए हवा चाहिए लकड़ी , और अन्य प्रकार की सुविधाए जो पेड़ पोधो से हमे प्राप्त होती है तो हुम्हे पेड़ पोधो की रक्षा करनी चाहिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए 2500 वर्ष पहले गौतम बुद्धा ने भी सभी को प्रेरणा और ज्ञान दिया की मनुष्य को हर साल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए

अब हम महान सम्राट चन्द्र गुप्ता मौर्या के समय की बात करे तो जब उनका शासन ३०० BC पूर्व शुरू हुआ तो उन्हें पेड़ों की जरूरत का एहसास बड़ी गहनता से हुआ और उन्होंने एक अधिकारी को जंगलों के देख रेख के लिए नियुकत किया और इसी प्रकार उनके पोते अशोक ने भी वन्य पराणी और पेड़ पोधो की रक्षा के लिए कड़े प्रयास किये और उन्होंने ये आदेश जारी किये की ज्यादा से ज्यादा संख्या मई पेड़ पोधे लगाए जाए जोकि गुप्ता काल तक जारी रहा

जंगलों का विनाश
ये उस समय की बात है जब मुस्लिमो ने भारत पर हमला किया और भारत में पलायन किया और अपने रहने की व्यवस्था के लिए उन्होंने बड़ी संख्या में पेड़ काटे और जंगलों को नस्ट किया मुस्लिम घुसपैठिए बड़े हे निर्दययि शिकारी थे वे जहां भी जाते बड़ी संख्या मई पेड़ों को नस्ट करते गए लेकिन बाद में मुगलो ने उद्यान और उनके विकास में अधिक रुचि दिखाई। अकबर अपने राज्य के विभिन्न भागों में वृक्षों के रोपण का आदेश दिया। जहांगीर अच्छी तरह से सुंदर उद्यान बाहर बिछाने और वृक्षों के रोपण के लिए जाना जाता था।

जब ब्रिटिश शासन का भारत में उदय हुआ तो ये जंगलों पर सबसे प्रभाव पूर्ण देखने को मिला बड़ी संख्या में पेड़ जैसे साल, सागौन, और चंदन के निर्यात के लिए काट रहे थे। आधुनिक भारतीय वानिकी का इतिहास एक प्रक्रिया जिसके द्वारा ब्रिटिश धीरे-धीरे वन संसाधनों राजस्व पीढ़ी के लिए विनियोजित था।

लेकिन कुछ समय बाद ब्रिटिश शासन ने भी जंगलों में पेड़ों की घटी संख्या को देखते हुए उनके संरक्षण के लिए कड़े कदम उठे 1800 में, मालाबार जंगलों में सागौन की उपलब्धता पर विचार करने के लिए एक आयुक्त नियुक्त किया गया था। 1806 में, मद्रास सरकार कैप्टन वाटसन सागौन और अन्य जहाजों के निर्माण के लिए उपयुक्त इमारती लकड़ी के उत्पादन के आयोजन के लिए वनों के आयुक्त के रूप में नियुक्त किया। 1855 में, लॉर्ड डलहौजी की पूरे देश में वन संरक्षण के लिए विनियम तैयार किए। सागौन वृक्षारोपण मालाबार हिल्स और बबूल और Niligiri पहाड़ियों में नीलगिरी में उठाए गए थे।

बंबई में, गिब्सन, वन, संरक्षक स्थानांतरण खेती और सागौन जंगलों के बागान प्रतिषेध नियम लागू करने की कोशिश की। 1865 से 1894 तक, इंपीरियल के लिए सामग्री को सुरक्षित करने की जरूरत है वन भंडार स्थापित किए गए थे। 18 वीं सदी से, वैज्ञानिक वन प्रबंधन प्रणालियों पुन: जनरेट करें और इसे स्थायी बनाने के लिए वन फसल करने के लिए कार्यरत थे। 1926 और 1947 के बीच वनरोपण पंजाब और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर किया गया। सन् १९३० के दशक में, लोग वन्य जीवन के संरक्षण में रुचि दिखाने शुरू कर दिया।

विश्व युद्ध के दौरान जहाजों और रेलवे स्लीपरों का निर्माण करने के लिए और ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों के लिए भुगतान करने के लिए लकड़ी की बड़ी मात्रा में आवशयकता थी ज्यादा से ज्यादा राजस्व पाने पर जोर था और इस कारण बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए

1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ, वानिकी संगठन में एक महान क्रांति हुई। राजसी राज्यों variably, स्थानीय आबादी के लिए और अधिक रियायतें देने में कामयाब रहे थे। इन राज्यों का स्थानांतरण करने के लिए सरकार इन क्षेत्रों में वनों की कटाई के लिए नेतृत्व किया। लेकिन कुछ वन अधिकारियों का दावा है कि महाराजाओं ने जंगलों के एक बहुत से भाग में कटौती और उन्हें बेच दिया। यह मामला कुछ उदाहरणों हो सकता है, लेकिन वन का एक बहुत कुछ मौजूद था जो खो गया है, के बाद से सरकार ने इन राज्यों को अपने अधिकार में ले लिया ले लिया।

1952 की नई वन नीति जंगल के सुरक्षात्मक कार्यों को मान्यता दी और वन के तहत भारत के भूमि क्षेत्र का एक-तिहाई पर बनाए रखने के उद्देश्य से। कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा अगले 50 वर्षों के विकास को देखा और जंगल के बारे में लोगों की सोच में परिवर्तन। एक रचनात्मक दृष्टिकोण के बारे में पाँच वर्षीय योजनाओं की एक संख्या के माध्यम से लाया गया था। 1976, तक वन संसाधन राज्य के लिए पैसे कमाने का एक स्रोत के रूप में देखा गया
1976 में, वन के शासन समवर्ती सूची के तहत आया था। ‘बिना विनाश के विकास’ और ‘अस्तित्व के लिए वनों’ और वन्यजीव भंडार में वृद्धि और वन विकास आदिवासी अर्थव्यवस्था के साथ जोड़नेके लक्ष्य को अगले दो पंचवर्षीय योजनाओं का महत्वपूर्ण विषयों रहा। लेकिन लक्ष्य और उपलब्धि के बीच एक बड़ा अंतर अभी भी मौजूद है।

लेकिन अब हम आपको पिछले तीन सालो का हाल बताने जा रहे है जो की बड़ा दुखद है इकनॉमिक ग्रोथ के लिए जंगलों को नस्ट किया गया है जिससे 2000 करोड़ का नुकशान हुआ है और 5450 sq kms जंगलों काट दिए गए है जिससे बड़ी मात्रा में प्रदूषण हुआ है किसी भी देश में विकास और परिवर्तन जरूरी है मगर किस कीमत पर विकास हो ये देखना बहुत जरूरी है

अगर हमने सही समय पर सही कदम नहीं उठाए और वनों को संसाक्षित नहीं किया तो परिणाम हमारे सामने होगा वैज्ञानिकों के अनुसार अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी हो सकती है 2050 में

हमारी आप सब से विनती है की की अपने आस पास ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाए हमे इनकी जरूरत है इनको हमारी नहीं और पेड़ लगाने से आपके आस पास के तापमान काम रहता है जिससे ३० % तक इलेक्ट्रिसिटी बचा सकते है